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अनुमंडल में रोजगार नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा, समृद्ध रहा है डुमरांव का औद्योगिक अतीत

डुमरांव14 घंटे पहले

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  • 1970-80 के दशक में औद्योगिक हब के रूप में बनी थी पहचान, डुमरांव टेक्सटाइल के साथ ही लालटेन फैक्टरी, सुप्रभात स्टील, कोल्ड स्टोरेज एक ही झटके में हो गए बंद

एक जमाने में सूबे के औद्योगिक मानचित्र पर सबसे उपर रहे डुमरांव का औद्योगिक वजूद मिट गया है। जिससे अनुमंडल क्षेत्र के हजारों श्रमिक पलायन को मजबूर हुये है। व्यवस्था तथा सरकारी उदासीनता से एक एक कर बंद हुई यहां की औद्योगिक ईकाइयों कभी भी विधानसभा चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाई है। इस बात का मलाल अनुमंडल के गरीब मजदूरों को है।

बताते चले कि 70 व 80 के दशक में डुमरांव औद्योगिक हब के रूप में उभरा था। तब यहां डुमरांव टेक्सटाइल के साथ ही लालटेन फैक्ट्री, सुप्रभात स्टील, कोल्ड स्टोरेज जैसे बड़ी औद्योगिक ईकाईयों थी। जहां हर दिन हजारों कामगर काम करते थे। ये वही दौर था जब इन बड़ी औद्योगिक ईकाइयों के साथ ही डुमरांव में लघु व कुटीर उद्योग भी अपने चरम पर था जहां एक बड़ी आबादी को रोजी रोटी का जुगाड़ घर बैठे हो जाता था।

तब डुमरांव की तंग गलियों में कही भेड़ पालन कर हस्तकरघा उद्योग चलाया जाता था तो कही प्रसिद्ध सिंधोरा उद्योग भी सूबे में अपनी ख्याति अर्जित कर चुका था। इसके अलावे मोमबती, अगरबत्ती सहित कई अन्य कुटीर उद्योग भी पनप रहे थे। लेकिन सरकारी कि उपेक्षा के कारण रोजगार बंद हो गए।

दिल्ली में रह रहे विजय शंकर दूबे, पटियाला में मजदूरी करने वाले मनोज यादव, चंदन सिंह सरीखे प्रवासी मजदूरो का कहना है कि यदि यहां पर उद्योग धंधे स्थापित होते तो रोजगार के तलाश में बाहर नहीं जाना पड़ता।
वर्ष 2000 बंगाल व उड़ीसा के कामगर मजदूर भी आते थे डुमरांव: चक्की के संतोष पाण्डेय कहते है कि वर्ष 2000 तक डुमरांव में बिहार के कोने कोने के साथ ही उत्तर प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा जैसे राज्यों से सैकड़ों कामगर आकर नौकरी करते थे। यहां के फैक्ट्रियों से निकलने वाला उत्पाद भी देश के कोने कोने में जाता था। इसके अलावे कृषि उत्पाद भी लोगों के आमदनी का बड़ा जरिया था। डुमरांव का दक्षिणी इलाका गन्ना तथा धान के उत्पादन में महत्वपूर्ण था तो उत्तरी हिस्सा गेहूं के साथ ही मक्का की फसल के लिये जाना जाता था। इसी समय नया भोजपुर में ग्लेज्ड टाईल्स फैक्ट्री भी स्थापित हुई थी। लेकिन उद्घाटन से पहले ही यह बंद हो गई।

90 के दशक में उद्योग धंधा का शुरू हुआ पतन

जानकार के बाते है कि 80 के दशक में यहां के समृद्ध उद्योग धंधा पर व्यवस्था की उदासीनता की नजर लगी और सारे कल कारखाने एक एक कर बंद होते चले गये। बड़े उद्योगों के बंद होने का असर लघु व कुटीर उद्योगों पर भी पड़ा। बारी बारी हस्तकरघा, अगरबती, मोमबत्ती जैसे कुटीर उद्योग के साथ ही डुमरांव में बनने वाला हस्तनिर्मित सिंधोरा उद्योग भी चौपट हो गया। सूबे में डुमरांव ही एक ऐसी जगह है जहां हाथ से सिंधोरा बनाया जाता है।

उद्योग धंधों के चौपट होने का सबसे बड़ा नुकसान यहां के मजदूरो को हुआ है। रोजगार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन कर चुके मजदूरो को इस बात का इल्म अब भी है कि किसी भी चुनाव में यहां की समृद्ध औद्योगिक विरासत को मुद्दा नहीं बनाया गया और न ही डुमरांव के उजड़े औद्योगिक वर्तमान को संवारने की कवायद किसी सरकार द्वारा किया गया। बावजूद चुनाव में इसको मुद्दा नहीं बनाये जाने से युवाओं में आक्रोश है।


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