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कुशवाहा का जरूरत से ज्यादा महात्वाकांक्षी होना कहीं महंगा ना पड़ जाए, पहले भी उनके साथ हो चुका है ऐसा

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  • Kushwaha Being Over ambitious May Not Be Expensive, It Has Happened To Him Earlier Too.

पटना30 मिनट पहले

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  • कभी नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी कहे जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने कई बार अपने आप को आजमाया है
  • अपनी महत्वाकांक्षा में कई बार अपने आप को मेनस्ट्रीम की राजनीति से अलग कर लिया।

कभी नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी माने जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने इस बार फिर पाला बदला है। उन्होंने पहली बार इस तरह का कदम नहीं उठाया है। उपेंद्र कुशवाहा शुरू से ही एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति रहे हैं और उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा में कई बार अपने आप को मेनस्ट्रीम की राजनीति से अलग कर लिया। 1960 में जन्मे उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक कैरियर वैशाली के समता कॉलेज में राजनीति शास्त्र के लेक्चरर के रूप में शुरू होता है। 1985 में वे इसी दौरान लोक दल में प्रदेश महासचिव बनते हैं । उसके बाद 1993 में लोक दल के राष्ट्रीय महासचिव बन जाते हैं। उपेंद्र कुशवाहा लगातार अपने आप को राजनीति का केंद्र बिंदु बनाना चाहते थे। लेकिन उसमें वह सफल नहीं हो पा रहे थे । 1995 में समता पार्टी से जब जंदाहा से वह चुनाव लड़े तो बुरी तरह से हार गए। फिर 2000 में जंदाहा से उपेंद्र कुशवाहा विधायक बने।

यहीं से उपेंद्र कुशवाहा का राजनैतिक ग्राफ आगे बढ़ने लगा। 2004 में जब सुशील मोदी भागलपुर से सांसद के रूप में चुने गए तो विपक्ष का कुर्सी खाली हुई। वहां नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को बैठा दिया। उपेंद्र कुशवाहा 1 साल तक विपक्ष के नेता के रूप में रहे। लेकिन 2005 में दलसिंहसराय से चुनाव हार जाने के बाद उन्होंने जेडीयू छोड़ दिया। उपेंद्र कुशवाहा ने 2008 में एनसीपी का दामन थाम लिया। लेकिन केंद्र बिंदु में रहने की चाहत रखने वाले उपेंद्र कुशवाहा एनसीपी में सरवाइव नहीं कर पाए । फिर उन्होंने सीएम नीतीश कुमार से समझौता कर लिया। नीतीश कुमार ने 2010 में उन्हें जेडीयू के टिकट से राज्यसभा भेज दिया । उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा से सांसद हो गए।

जदयू के सांसद बनने के बाद 2012 में उपेंद्र कुशवाहा ने एक बार फिर से पार्टी लाइन से अलग लाइन ले लिया। एफडीआई बिल पर उपेंद्र कुशवाहा ने जेडीयू से अलग वोट कर दिया। सीएम नीतीश कुमार नाराज हो गए । पार्टी में रहते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार को तानाशाह तक कह डाला। फिर राजगीर के जेडीयू के कार्यकर्ता सम्मेलन में भरी सभा में उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार के सामने इस्तीफा देने का प्रस्ताव रख दिया और उन्होंने पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

2013 में उपेंद्र कुशवाहा ने अरुण कुमार के साथ मिलकर आरएलएसपी नाम की एक नई पार्टी बनाई। उस समय नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था। बीजेपी ने उपेंद्र को प्रमोट किया और वो एनडीए में शामिल हो गए। 2014 में उपेंद्र कुशवाहा ने 3 सीटों पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और तीनों सीटें जीत लीं। कुशवाहा केंद्र में राज्य मंत्री बनाए गए। इसी बीच 2015 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो एनडीए ने इन्हें 23 सीटें विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए दी। वह मात्र 2 सीटों पर जीत हासिल कर पाए।

2018 आते-आते उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में कंफर्टेबल नहीं रह गए। उन्होंने केंद्र के राज्य मंत्री से इस्तीफा दे दिया और यूपीए में शामिल हो गए। महागठबंधन में शामिल होते ही उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि केंद्र की सरकार जनता की आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया। उसी समय उनके जहानाबाद के सांसद और आरएलएसपी के प्रदेश अध्यक्ष अरुण कुमार ने पार्टी से अपने आपको अलग कर लिया और अलग पार्टी बनाई-आरएलएसपी सेक्यूलर। कुशवाहा को एक और झटका तब लगा जब इनकी पार्टी के दो विधायक जेडीयू में शामिल हो गए और विधानसभा में इनके पार्टी का विलय जेडीयू के साथ हो गया।

महागठबंधन में रहने के साथ उपेंद्र कुशवाहा ने खुद 2019 में दो जगहों से चुनाव लड़ा लेकिन लोकसभा के चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा दोनों जगह से हार गए। अब 2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने इन्हें तरजीह नहीं दी तो कयास लगाया जाने लगा कि एनडीए में शामिल होंगे लेकिन कुशवाहा ने एक अलग राह चुनी। यह राह बीएसपी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने की थी। उपेंद्र कुशवाहा एक बार फिर से राजनीति के केंद्र बिंदु तो नहीं बन पाए लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में हाशिए पर जरूर चले गए हैं।


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