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ग्रामीण स्तर पर खेती के विकास की नीति बनाई जाएगी

हरनौत9 मिनट पहले

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  • कृषि विज्ञान केंद्र में 220 कृषि सलाहकार व समन्वयकों को दी गयी ट्रेनिंग

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर (भागलपुर) के तत्वावधान में कृषि विज्ञान केंद्र के सभागार में जिले के 220 कृषि सलाहकार व समन्वयकों को ट्रेनिंग दी गई। कार्यक्रम का उद्देश्य जिले के विभिन्न पंचायत, गांव में मिट्टी, जल व कृषि संबंधी अन्य आवश्यक शर्तों की विविधता, उनकी प्रकृति के बारे में जानकारी का संकलन करना है।

पौधा संरक्षण के सहायक निदेशक अनिल कुमार ने बताया कि इसकी रिपोर्ट बामेती, पटना को सौंपी जायेगी। इसके आधार पर क्षेत्र विशेष में किसानों को वहां की मिट्टी, जल व अन्य संसाधनों को देखते हुए ग्रामीण स्तर पर कृषि विकास की नीति बनाई जायेगी। अभी तक जिला और प्रखंड स्तर के हिसाब से ही कृषि विकास की नीति तैयार की जाती थी।
चार समूह बनाकर दी ट्रेनिंग
केंद्र प्रभारी डॉ ब्रजेंदु कुमार ने बताया कि जिले में 249 पंचायतें हैं। नगर पंचायतों को छोड़कर 170 में कृषि सलाहकार व 50 में कृषि समन्वयक हैं। सभी को क्रमवार चार समूह बनाकर चार दिनों में एक-एक दिन की ट्रेनिंग दी गई। यह ट्रेनिंग क्रमशः 5, 6, 7 और 9 अक्टूबर को दी गई। अंतिम दिन सभी कृषि समन्वयकों को ट्रेनिंग दी गई। साथ ही संबंधित क्षेत्र में जलवायु, मिट्टी, पानी आदि की प्रकृति की जानकारी का पंजी संकलन किया गया।
निचले क्षेत्रों में जलजमाव से मिट्‌टी की प्रकृति अलग
मिट्टी विशेषज्ञ डा. उमेश नारायण उमेश ने बताया कि जिले के कुछ प्रखंडों में जमीन ऊंची है। कहीं काफी नीची है तो कहीं मध्यम है। वर्षापात में भी कभी-कभी काफी अंतर हो जाता है। निचले क्षेत्रों में जलजमाव से वहां के मिट्टी की प्रकृति अलग होती है। जबकि ऊंची जमीन के इलाकों की मिट्टी अपेक्षाकृत धूसर होती है। उसमें पानी का ठहराव अधिक समय तक नहीं होता है।

जिससे विभिन्न क्षेत्रों में धान, गेहूं, दलहन, तेलहन आदि के अलग-अलग प्रभेद की खेती सही होती है। यही नहीं वहां के ताप, नमी, हवा आदि के प्रभाव से अलग-अलग तरह के कीट-व्याधि पनपते हैं। यही कारण है कि कहीं बाढ़ तो कहीं सुखाड़ और अलग-अलग कीट-व्याधि का प्रकोप झेलना पड़ता है। जिसका नुकसान अंततः किसान ही झेलते हैं।

इसी दृष्टिकोण से विभिन्न धरातल व प्रकृति वाले गांवों का वर्गीकरण करके वहां पर विशेष कृषि नीति अपनाने की ज़रुरत है। इसी के लिए जैव विविधता पंजी संकलन नाम से प्रसार कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी गई। साथ ही क्षेत्र विशेष का फीडबैक लिया गया। कार्यक्रम में डा. संजीव रंजन ने पशुपालन को केंद्र में रखकर अपने अनुभव बताये।


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