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चुनाव में भाजपा नीतीश के लिए और नीतीश भाजपा के लिए क्यों हैं जरूरी

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  • Why Are Nitish Important For BJP And Nitish For BJP In Elections JDU Had A Vote Share Of 16.8 In The 2015 Assembly Elections Compared To 22.58 Percent In 2010.

पटना25 मिनट पहलेलेखक: बृजम पांडेय

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नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी।

  • 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू का वोट प्रतिशत 16.8 जबकि 2010 में 22.58 प्रतिशत था
  • 2015 में जदयू भाजपा के साथ नहीं था, जबकि 2010 में दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़े थे

कहते हैं जब तक बिछड़ेंगे नहीं, तब तक एक-दूसरे के महत्व को समझेंगे नहीं। शायद यही समझ भाजपा और जदयू में पनप गई है। तभी तो ये दोनों दल किसी भी हालत में एक-दूसरे से जुदा नहीं होना चाहते। हाल के दिनों में सीट बंटवारे को लेकर खूब खींचतान मची। दोनों दलों के नेताओं ने यहां तक कह दिया कि अब साथ रहना मुश्किल हो गया है। लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं। दोनों दलों के बड़े नेता ये समझने लगे कि एक-दूसरे के बिना बिहार विधानसभा या लोकसभा का चुनाव जीता नहीं जा सकता। ऐसा क्यों हुआ, इसे जानने के लिए पिछले कुछ चुनावों के समीकरण को समझना होगा।

2015 में भाजपा का गुरूर टूटा
पहले बताते हैं कि भाजपा के लिए नीतीश कुमार कैसे खास हो गए? इसके लिए पिछले विधानसभा चुनाव के समीकरण को देखना होगा। भाजपा, लोजपा, हम, रालोसपा साथ में चुनाव लड़े थे। पीएम नरेंद्र मोदी ने तूफानी चुनाव प्रचार किया था। पूरा तंत्र झोंकने के बावजूद भाजपा मात्र 53 सीटें जीत सकी। 2015 में भाजपा का वोट प्रतिशत 24.4 इसलिए बढ़ गया क्योंकि उसने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। नीतीश कुमार के जदयू और लालू प्रसाद के राजद ने 101-101 सीटों पर लड़ा था। जदयू ने 71 और राजद ने 80 सीटों पर जीत दर्ज की। जदयू का वोट प्रतिशत 16.8 और राजद का 18.4 रहा। इसी गठबंधन में शामिल कांग्रेस ने 41 सीटों में से 27 पर जीत हासिल की थी। जब भाजपा हार गई तो उसे महसूस होने लगा कि उसके लिए नीतीश कितने जरूरी थे। हर तंत्र लगाने और बड़े नेताओं के तूफानी दौरों के अलावा चुनाव प्रचार में सबसे ज्यादा खर्च करने के बाद भी भाजपा बुरी तरह से हार गई थी। लोजपा 41 में से मात्र दो सीटें जीत पाई। ये पूरा साइड इफेक्ट था नीतीश कुमार के एनडीए में न होने का।

2014 में नीतीश कुमार को खानी पड़ी पटखनी
अब ये जान लेते है कि नीतीश कुमार के लिए भाजपा क्यों इतनी खास हो गई है। इसे जानने के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव के समीकरण को समझना होगा। 2013 में जब नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर 2014 में लेफ्ट पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे, तो 40 लोकसभा सीटों में से मात्र दो सीटों पर ही जीत हुई थी। जबकि भाजपा ने लोजपा और रालोसपा के साथ मिलकर 31 सीटों पर फतह हासिल की थी ।

2010 में तो जदयू-भाजपा की जोड़ी ने किया कमाल
जदयू- भाजपा ने जब-जब साथ मिलकर चुनाव लड़ा, दोनो का परफॉर्मेंस बेहतर रहा है। उदाहरण के तौर पर 2010 में 141 सीटों पर जदयू ने अपने प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से 115 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जदयू वोट का प्रतिशत भी बढ़ा था जो 22.58 प्रतिशत रहा था। वहीं, भाजपा ने 2010 के चुनाव में 102 प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें 91 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। भाजपा का वोट प्रतिशत 16.49 रहा था। इस चुनाव में लोजपा लालू यादव के साथ थी। लोजपा ने 75 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन मात्र 3 उम्मीदवार ही विधायक बन पाए थे। लोजपा का वोट प्रतिशत 6.74 प्रतिशत रहा था। वहीं, राजद ने 168 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे लेकिन महज 22 उम्मीदवार जीत पाए थे। राजद का वोट का प्रतिशत 18.84 रहा था।


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