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ताउम्र दलितों के एकछत्र नायक बने रहे, आपातकाल का विरोध करने पर काटनी पड़ी थी जेल की सजा

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बिहार5 घंटे पहले

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पटना स्थित आवास पर दोनों भाइयों रामचंद्र पासवान (बाएं) और पशुपति कुमार पारस के साथ रामविलास पासवान। रामचंद्र पासवान का पिछले साल निधन हुआ था। अब तीन भाइयों में पशुपति अकेले रह गए।

(भैरव लाल दास) खगड़िया जिला के शहरबन्नी गांव के जामुन पासवान और सिया देवी के लाडले रामविलास पासवान का जन्म 5 जुलाई, 1946 को हुआ। कोसी कॉलेज, खगडि़या से स्नातक एवं पटना विश्वविद्यालय से एमए करने के बाद 1969 में इनका चयन डीएसपी पद के लिए हो गया लेकिन पुलिस सेवा उन्हें पसंद नहीं आई। 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर एमएलए बने। 1970 में एसएसपी के संयुक्त सचिव बनाए गए।
1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल का विरोध करने के कारण इन्हें जेल में डाल दिया गया, 1977 में जेल से रिहा हुए। लोकदल का गठन होने के बाद पार्टी ने इन्हें सचिव बनाया और 1985 में लोकदल के महासचिव बनाए गए। मोरारजी देसाई को छोड़कर राजनारायण के साथ जे.पी.(एस.) में आए। 1987 में जनता दल के महासचिव बनाए गए।

राजनीतिक मोर्च पर जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर, राजनारायण और सत्येंद्र नारायण सिन्हा से इनकी अधिक नजदीकियां थीं। अप्रैल, 2002 में गुजरात दंगा की आड़ में केंद्रीय मंत्रीमंडल से इस्तीफा देने का मुख्य कारण यह था एनडीए का पतन दिख रहा था और भाजपा और बसपा में दोस्ती होनी शुरू हो गई थी।

जिससे मायावती को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता साफ हो गया था। 2004 में यूपीए के साथ गठबंधन किया और केन्द्र में रसायन एवं उर्वरक मंत्री बनाए गए, पुन: इस्पात मंत्रालय का भी प्रभार मिला। 2009 में राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़े लेकिन हाजीपुर सीट से चुनाव हार गए। सीधा विदेशी विनिवेश के मुद्दे पर यूपीए से 2012 में अलग हो गए।
2014 में किया भाजपा से गठबंधन
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा एवं लोजपा का गठबंधन हो गया और एक साथ लोकसभा का चुनाव लड़ा। इसमें लोजपा ने 6 सीट जीते। स्वयं रामविलास पासवान नौंवी बार चुनाव जीते और केन्द्र में उपभोक्ता संरक्षण मंत्रालय मिला। 1 जुलाई, 2019 को दूसरी बार राज्य सभा के सदस्य बनाए गए। पासवान को 6 प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का मौका मिला।
चुहरमल मेला से गहरे जुड़े थे पासवान
1995 में चुहरमल मेला के अवसर पर स्वयं लालू प्रसाद ने इसे महिमामंडित किया था। रामविलास इससे गहरे जुड़े थे। हर साल बड़ा आयोजन करते थे। 1970 में बेलछी में पासवान जातियों के साथ कुर्मी जमींदार का विवाद हुआ था। हालांकि नक‍सल गतिविधियों में कुर्मी-कोईरी, पासवान और यादव, तीनों जातियों की सहभागिता के कारण ही ये संघर्ष में बीस पड़ते थे। इनमें जगदीश महतो, रामनरेश राम और रामेश्वरी अहीर ने बुनियाद डाली थी। 1990 में जहानाबाद के सेनारी में पासवान और यादव ने मिलकर 34 भूमिहारों की हत्या कर दी थी।

पासवान ने ही समझा था दलितों का असली दर्द

पीढि़यों के संघर्ष के अंतर को स्पष्ट करते हुए रामविलास पासवान ने कहा था कि मेरे पिताजी को यदि कोई एक तमाचा लगा देता या बैठने के लिए जगह नहीं देता तो वे खून का घूट पीकर रह जाते। मेरे समय में इसका विरोध होना शुरू हो गया था। लेकिन आज यदि किसी दलित युवक के साथ दुर्व्यवहार होगा तो वे इसका जमकर विरोध करेंगे और अपने अधिकार की रक्षा के लिए वे कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाएंगे।

पहले दलितों की सामाजिक स्थिति अत्यंत खराब थी। गांव पार करते समय जूता हाथ में लेना पड़ता था और शादी के समय भी उन्हें घोड़ी पर चढ़ने की इजाजत नहीं होती थी। लेकिन रामविलास पासवान ने उन्हें एक अलग तेवर दिया जिसमें आक्रामकता तो थी लेकिन सहभागिता भी थी। यदि नीतीश कुमार महादलित को बांटकर सामाजिक समीकरण नहीं गढ़ते तो रामविलास न तो इतने आक्रामक होते और न दलितों के वोट का इतना महत्व बढ़ता। रामविलास ने इसे सामान्य शब्दों में समझाया था कि पहले दिल मिलेगा, तभी पार्टी भी

कांग्रेस से दलितों की दूरी के बाद पासवान बने उनके नेता

1971 में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। दलित मतदाताओं की गोलबंदी आरंभ हो गई। 1972 में दलित पैंथर का गठन हुआ और दलित वोट बैंक में तब्दील होने लगे। 1977 के चुनाव के ठीक पूर्व ही जगजीवन राम कांग्रेस से बाहर हो गए और दलितों का कांग्रेस के साथ दूरी बढ़नी आरंभ हो गई। इसी समय कानपुर और लखनऊ में दलितों की आक्रामकता बढ़नी शुरू हुई।

कांशीराम नेता बने और दलित पैंथर तथा बामसेफ आदि संगठनों की धार तेज होती गई। मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद थोड़ी शांति 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद आई। रामविलास पासवान ने बिहार में दलितों एवं अन्य जातियों के साथ सहभागिता की राजनीति की। भोला पासवान शास्त्री और रामसुंदर दास की स्वीकार्यता कम होने के कारण रामविलास को यह अच्छा अवसर मिला कि वह बिहार के दलितों के दलितों के एकछत्र नायक बने।
बाबा साहब को भारत रत्न दिलाने में भूमिका निभाई

नीतीश द्वारा महादलित में विभाजन कर, विशेष रूप से पासवान जाति को महादलित से अलग रख देने के बाद इनसे दूरी बनी लेकिन नरेन्द्र मोदी से नजदीकी बनी रही। रामविलास पासवान ने ही हरिजन थाना के नए स्वरूप का प्रस्ताव दिया था। बाबा साहेब की मूर्ति स्थापना, उनके जन्मदिन पर छुट्टी और उन्हें भारत रत्न दिलाना और उनके पोता को राज्य सभा का सदस्य बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही।

1977 में जब रामविलास हाजीपुर से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तो उनके विरोध में प्रचार करने के लिए इंदिरा गांधी स्वयं हाजीपुर पहुंची। तीन लाख लोग इंदिरा गांधी को देखने के लिए आए। लेकिन इसी चुनाव में रामविलास ने सबसे अधिक वोटों से अपनी जीत कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम लिखाया। उन्होंने पहली बार यह सिद्ध कर दिया कि राजनीति में चकाचौंध एक अलग चीज है और मतदाताओं को प्रभावित करना दूसरी चीज है।
वीपी सिंह ने पासवान को दिया था सीएम का प्रस्ताव

दलितों की सामाजिक स्थिति देखते हुए ही 1990 में वीपी सिंह ने रामविलास पासवान को बिहार का मुख्यमंत्री बनने का प्रस‍ताव दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी और यहां तक कि दलितों की मजबूत स्थिति को देखते हुए 2005 में नीतीश कुमार ने भी उन्हें यह प्रस्ताव दिया था। दलितों में 22 उपजातियां हैं, बिहार में करीब 1300 महादलित मुखिया और सरपंच हैं। बिहार की कुल मतदाताओं में 16 प्रतिशत दलित हैं।

इनमें दुसाध, चमार,धोबी और मुसहर प्रमुख जातियां हैं। बिहार की कुल आबादी का 5-6 प्रतिशत तथा दलित मतदाताओं में 37 प्रतिशत दुसाध हैं। इसी तरह 6-7 प्रतिशत आबादी के साथ 39 प्रतिशत दलित चमार जाति के हैं। इसके बाद पासी एवं धोबी की संख्या है और बाकी जातियों के संख्यागत आंकड़े इससे कम ही हैं। बिहार में दलितों को गोलबंद कर वोट हस्तांतरित करने की क्षमता सिर्फ रामविलास पासवान में ही थी।


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