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राजनैतिक महत्वाकांक्षा ने उपेंद्र कुशवाहा को महागठबंधन से अलग किया, लोजपा भी उसी राह पर

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पटना4 घंटे पहले

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रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बसपा से गठबंधन का ऐलान किया था।

  • राजनीति महत्वाकांक्षा के लिए किसी भी गठबंधन और किसी से भी समझौता कर लेते हैं नेता
  • कुशवाहा ने जब बीएसपी से गठबंधन जोड़ा तो उन्होंने महागठबंधन और एनडीए पर जमकर हमला बोला था

राजनीति महत्वाकांक्षाओं पर आधारित होती है और इसका जीता जागता उदाहरण बिहार विधानसभा चुनाव है। इस चुनाव में जिस तरह से गठबंधन बने और बिखरे, उससे साफ पता चलता है कि राजनीति में महत्वाकांक्षाएं इतनी ज्यादा बढ़ जाती हैं कि जो नेता होते हैं वह अपने लिए किसी भी गठबंधन और किसी से भी समझौता कर लेते हैं। उसके बाद अपनी महत्वाकांक्षा को साधने के लिए जिसके खिलाफ चुनाव लड़े होते हैं उसके साथ जाकर मिल जाते हैं। बिहार चुनाव में जिस तरह से रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने अपना पाला बदला, इससे साफ पता चला कि उनकी और उनके गठबंधन के बड़े नेताओं की महत्वाकांक्षा इतनी ज्यादा हो गई कि वह एक पल्ले नहीं बैठ पाए और गठबंधन टूट गया। जबकि समीकरण, गुना-भाग पहले ही तय हो जाता है।

कुशवाहा ने जब बीएसपी से गठबंधन जोड़ा तो उन्होंने महागठबंधन और एनडीए पर जमकर हमला बोला। कहा कि महागठबंधन से लेकर एनडीए के सभी घटक दल भाजपा के इशारे पर काम करते हैं और उन्हीं के इशारे पर गठबंधन टूट और बन रहे हैं। कुशवाहा ने तेजस्वी यादव पर अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया और कहा कि वह इतने पढ़े लिखे नहीं हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री बन सकें। रालोसपा प्रवक्ता भोला शर्मा बताते हैं पार्टी अपने अस्तित्व से कभी समझौता नहीं करेगी। बात जब एनडीए और महागठबंधन में सीट बंटवारे की हो रही थी तो रालोसपा इसके बीच में नहीं थी क्योंकि उपेंद्र कुशवाहा ने इस पार्टी को सींच कर यहां तक लाया है और हम अपने अस्तित्व के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते। हालांकि लोजपा का कोई नेता कुछ भी साफ साफ नहीं कहता।

राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी उपेंद्र कुशवाहा के इस कदम पर कहते हैं कि वे स्थिर रहने वाले नेता नहीं है। उनकी इच्छा मुख्यमंत्री बनने की थी, लेकिन उनको यह समझना चाहिए था कि महागठबंधन में बिहार विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है। तब मुख्यमंत्री के उम्मीदवार भी तेजस्वी यादव ही होंगे। उनका अति महत्वाकांक्षी होना उनके पतन का कारण है। मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि लोजपा का उपयोग भाजपा कर रही है। वहीं जदयू के मुख्य प्रवक्ता संजय सिंह कहते हैं उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता पानी के बुलबुले होते हैं जो बरसात के समय बड़े-बड़े जरूर हो जाते हैं लेकिन बाद में फूट जाते हैं। वही हाल उपेंद्र कुशवाहा के साथ है। चुनाव के समय फैलते जरूर हैं लेकिन चुनाव के बाद टायं-टायं फिस्स हो जाएंगे। जदयू नेता संजय सिंह ने लोजपा पर कुछ भी नहीं कहा।

वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि एनडीए और महागठबंधन में बहुत कुछ पहले फिक्स हो गया था। याद होगा जब लोकसभा का चुनाव हुआ था उसमें सारी बातें तय हो गई थीं और दोनों गठबंधन का चुनाव में सीटों पर बंटवारा हो गया था। यदि लोकसभा के समीकरण को माना जाए तो जो सीटों का बंटवारा होना चाहिए उसके मुताबिक आधे-आधे पर जदयू और भाजपा को चुनाव लड़ना चाहिए। इसके अलावा जो सीटें बचती हैं उन पर लोजपा को चुनाव लड़ना चाहिए था। लेकिन जिस तरह से जीतनराम मांझी एनडीए में आए और उपेंद्र कुशवाहा का एनडीए के नेताओं से बातचीत होने लगी, इस समीकरण को जटिल करता रहा। फिर भी यदि जदयू और भाजपा चाहे तो लोजपा के साथ एक समझौता बेहतर तरीके से बन सकता है। उन्होंने कहा कि उपेंद्र कुशवाहा का महागठबंधन और एनडीए से अलग होना उनके महत्वाकांक्षा को दर्शाता है और यही वजह है कि तमाम बातें होने के बावजूद भी वह अपने लिए किसी गठबंधन में शामिल नहीं हुए।


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