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लाखों की नौकरी छोड़ ऑर्गेनिक अमरूद की बागवानी शुरू की, एक सीजन में 12 लाख रु. की कमाई, 5 लोगों को रोजगार भी दिया

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  • Leaving Lakhs Of Jobs, Started Organic Guava Gardening, Earning 12 Lakhs In A Season, Also Employing 5 People

सांगली30 मिनट पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

महाराष्ट्र के सांगली जिले के अंकलखोप गांव के रहने वाले शीतल सूर्यवंशी ऑर्गेनिक अमरूद की बागवानी करते हैं।

  • अच्छे किस्म की अमरूद के पौधे लगभग एक साल में तैयार हो जाते हैं, पहले साल में एक पौधे से 6-7 किलो तक अमरूद निकलता है, उसके कुछ समय बाद 10-12 किलो तक उत्पादन होने लगता है
  • आज हर दिन 4 टन अमरूद उनके बगीचे से निकलता है, मुंबई, पुणे, सांगली सहित कई शहरों में वे अमरूद भेजते हैं, हर दिन 10 हजार रु की कमाई हो रही है

महाराष्ट्र के सांगली जिले के अंकलखोप गांव के रहने वाले शीतल सूर्यवंशी एमबीए करने के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करते थे। लाखों की सैलरी थी, 6 साल तक उन्होंने अलग-अलग पोस्ट पर काम किया। लेकिन, 2015 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और ऑर्गेनिक अमरूद की बागवानी का बिजनेस शुरू किया। आज हर दिन 4 टन अमरूद उनके बगीचे से निकलता है। मुंबई, पुणे, सांगली सहित कई शहरों में वे अमरूद भेजते हैं। एक सीजन में 12 लाख रुपए की कमाई हो रही है।

34 साल के शीतल के पिता किसान हैं। दो भाई जॉब करते हैं, एक डॉक्टर है और दूसरा आर्किटेक्ट। शीतल कहते हैं, ‘ जब नौकरी छोड़कर खेती करने का फैसला लिया तो परिवार ने विरोध किया। उनका कहना था कि अच्छी खासी नौकरी छोड़कर खेती क्यों करना चाहते हो, खेती में मुनाफा ही कितना है..?

वो कहते हैं कि हम जहां रहते हैं वहां के ज्यादातर किसान गन्ने की खेती करते हैं। मेरे पिता भी गन्ने की खेती करते थे लेकिन इसमें ज्यादा मुनाफा नहीं होता था। ऊपर से समय भी ज्यादा लगता था। एक फसल तैयार होने में 15-16 महीने लग जाते थे। साथ ही फैक्ट्री में बेचने के बाद पैसे देर से अकाउंट में आते थे।

2015 में शीतल ने नौकरी छोड़ दी और ऑर्गेनिक अमरूद की बागवानी का बिजनेस शुरू किया।

इसलिए मैंने सोचा कि कुछ अलग करने का रिस्क लिया जाए। बाकी किसान तो गन्ना बो रहे हैं लेकिन हम दूसरी फसल लगाएंगे। शुरुआत मैंने अंगूर से की लेकिन इसमें कुछ खास मुनाफा नहीं हुआ। इसी बीच मेरा एक दोस्त मुझसे मिला। शिरडी में अमरूद की उसकी नर्सरी थी। उसने मुझे ऑर्गेनिक अमरूद उगाने का आइडिया दिया। इसके बाद मैं शिरडी गया, वहां के बागानों में गया और अमरूद की खेती को सीखा।

शीतल बताते हैं’ ‘जब मैंने अपने पिता को अमरूद उगाने के बारे में बताया तो उन्होंने मना कर दिया। वो नहीं चाहते थे कि गन्ने की जगह हम किसी और फसल को उगाने का जोखिम लें। फिर मैंने उन्हें समझा बुझाकर दो एकड़ जमीन पर अमरूद लगाने फैसला किया। इसके बाद मैं अलग-अलग शहरों में गया। वहां अमरूद के मार्केट, कहां कितनी डिमांड है और वहां तक हमें पहुंचने का रास्ता क्या होगा, मिट्टी कैसी होनी चाहिए, प्लांट की कौन सी नस्ल ठीक होगी, इन सब चीजों को लेकर कुछ दिन रिसर्च की।’

वो बताते हैं,’ अगस्त 2015 में मैंने 2 तरह की अमरूद की फसल लगाई। एक ललित और दूसरी किस्म जी विलास की। पहले साल ही 20 टन का प्रोडक्शन हुआ था। 3-4 लाख रु की आमदनी हुई थी। इससे हमारा मनोबल बढ़ा और अगले सीजन से हमने और ज्यादा जमीन पर अमरूद उगाने का प्लान बनाया।’

वे केमिकल फर्टिलाइजर की जगह जैविक खाद का उपयोग करते हैं। पेड़ की सड़ी पत्तियों को गड्ढा खोदकर नीचे डाल देते हैं।

वे केमिकल फर्टिलाइजर की जगह जैविक खाद का उपयोग करते हैं। पेड़ की सड़ी पत्तियों को गड्ढा खोदकर नीचे डाल देते हैं।

शीतल आज 4 एकड़ जमीन पर अमरूद उगा रहे हैं। 5 लोग उनके साथ काम करते हैं। हर एकड़ में 10 टन अमरूद निकलता है। अभी तीन प्रमुख किस्म ललित, जी बिलास और थाईलैंड पिंक का उत्पादन होता है। ललित की साइज छोटी होती है, जबकि जी बिलास और थाईलैंड पिंक का साइज बड़ा होता है।

शीतल बताते हैं,’ गन्ने की खेती में टाइम तो ज्यादा लगता ही था, साथ ही पानी ज्यादा देना होता था। ऊपर से हर साल कल्टीवेशन की जरूरत होती थी। लेकिन, अमरूद की खेती में ऐसा नहीं होता है। एक बार प्लांट लगा दिया तो 10-12 साल की छुट्टी हो गई। इससे हर साल प्लांटेशन में होने वाला खर्च बचता है।

शीतल कहते हैं कि पिछले साल बाढ़ आई थी तो हमें नुकसान हुआ था। इस बार जब कोरोना के चलते लॉकडाउन लगा तो ज्यादा घाटा हुआ। 4-5 टन अमरूद पक के सड़ गया, उसे हम मार्केट में नहीं ले जा पाए। लेकिन, अब जुलाई के बाद से हालात सामान्य हो रहे हैं और धीरे-धीरे सबकुछ पटरी पर वापस लौट रहा है। अब मार्केट में वापस से हम अमरूद की सप्लाई कर रहे हैं।

वो कहते हैं कि हर साल काफी संख्या में अमरूद पक कर नीचे गिर जाते हैं, कई बार पूरे अमरूद बिक भी नहीं पाते। इसलिए आगे हम एक प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के बारे में विचार कर रहे हैं ताकि इन अमरूदों से दूसरे प्रोडक्ट तैयार किया जा सके।

आज हर दिन 4 टन अमरूद उनके बगीचे से निकलता है। उन्होंने तीन किस्म की अमरूद अपने बगीचे में लगाए हैं।

आज हर दिन 4 टन अमरूद उनके बगीचे से निकलता है। उन्होंने तीन किस्म की अमरूद अपने बगीचे में लगाए हैं।

कैसे करें ऑर्गेनिक अमरूद की खेती

शीतल बताते हैं कि ऑर्गेनिक अमरूद की बागवानी शुरू करने से पहले रिसर्च जरूरी है। आपको जहां खेती करनी है वहां के मार्केट, डिमांड और ट्रांसपोर्टेशन के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसके साथ ही हम जिस जमीन पर बागवानी शुरू करने जा रहे हैं वो कम पानी वाली होनी चाहिए। हमें केमिकल फर्टिलाइजर की जगह ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर का उपयोग करना चाहिए। इससे जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ती है। दो पौधों के बीच 9/6 की दूरी होनी चाहिए। जुलाई से सितंबर के महीने पौधे लगाए जाते हैं।

कितना वक्त लगता है एक पौधे के तैयार होने में

अच्छे किस्म की अमरूद के पौधे लगभग एक साल में तैयार हो जाते हैं। पहले साल में एक पौधे से 6-7 किलो तक अमरूद निकलता है। उसके कुछ समय बाद 10-12 किलो तक उत्पादन होने लगता है।

क्या- क्या सावधानियां जरूरी है
शीतल बताते हैं कि अमरूद की बागवानी के लिए सही समय और सही मिट्टी का होना जरूरी है। हमें कम पानी वाली मिट्टी पर इसकी प्लांटिंग करनी चाहिए। इस पर क्लाइमेट और बारिश का असर ज्यादा होता है, इसलिए उसके लिए पहले से तैयारी जरूरी है। ज्यादा प्रोडक्शन के लिए अक्सर लोग केमिकल फर्टिलाइजर का उपयोग करने लगते हैं। लेकिन, हमें इससे बचना चाहिए। इससे प्लांट को नुकसान तो होता ही है साथ ही हमारी जमीन की सेहत के लिए भी ये ठीक नहीं होता है।

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