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वक्त कोई भी हो चुनावी मुकदमा जनता ही हारी है, इस बार अंगूठा लगाकर कई नेता अपना काम साधना चाहते हैं

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बिहार चुनाव3 मिनट पहले

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शेखर सुमन, बाॅलीवुड के अभिनेता। -फाइल फोटो।

सु नो, सुनो, सुनो बिहार के चुनाव ने दस्तक दे दी है और जब चुनाव दस्तक देता है तो पांच साल तक नजर ना आनेवाले नेता भी आपके घर पर दस्तक दें, इसकी संभावना बढ़ जाती है। बिहार में जब से चुनाव की तारीखों का ऐलान हुआ है, तब से हर नेता अपने विपक्षी से कह रहा है कि अब उनके हिसाब किताब करने की तारीख आ चुकी है।

कुछ नेताओं ने तो पर्चा दाखिल करने की तारीख मिलने के बाद सुना है ट्यूशन लेना भी शुरू कर दिया है कि पर्चा भरा कैसे जाता है? कई नेता अंगूठा लगाकर अपना काम चलाने की सोच रहे हैं। वैसे जनता इस बार ऐसे उम्मीदवारों को अंगूठा दिखाने की भी सोच रही है, लेकिन उम्मीद बनाए रखने वाले को ही उम्मीदवार कहा जाता है। वैसे मुझे लगता है कि कई उम्मीदवारों को तो ये भी बताना पड़ेगा कि अंगूठा कैसे लगाया जाता है? ये अंगूठे से काम चलने वाले नेता अब बिहार का भविष्य बनाना चाहते हैं। वैसे तेजस्वी यादव ने तो कह दिया है कि असल में बिहार का भविष्य वो हैं और बिहार का भविष्य तभी उज्जवल हो सकता है जब बिहार को उनके सुपुर्द कर दिया जाए। उपमुख्यमंत्री की कुर्सी जबसे उनसे छीनी गई है तब से सुनने में आया है कि उन्हें सपने में भी केवल कुर्सी ही दिखाई देती है। लेकिन इस बार वो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना चाहते हैं।

वैसे उनके बड़के भैया तेज प्रताप यादव भी उस कुर्सी पर अपना हक समझते थे। बीच में इसको लेकर काफी चर्चा भी हुई। तेज प्रताप के समर्थक कहने लगे कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनको ही बैठना चाहिए। वैसे इससे ज्यादा खबर तो इस बात की बनी कि तेज प्रताप यादव के भी कुछ समर्थक हैं। ये अपने आप में बहुत बड़ी बात थी।

वैसे समर्थकों के जोर पर चुनाव लड़ा जाता है और जब चुनाव की तारीख की घोषणा हुई तो कांग्रेस पार्टी के ढेर सारे समर्थक बिहार की गलियों में निकल पड़े। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ा दी गई। वैसे उन समर्थकों की दलील थी कि सत्ता के बिना वैसे भी उनके इतने बुरे हाल हैं कि कोरोना भी इससे बदतर नहीं हो सकता।

वैसे नीतीश जी यानि सुशासन बाबू के नाम से चर्चित मुख्यमंत्री पर कांग्रेस ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। मगर कांग्रेस की आवाज अधिक लोगों तक पहुंच नहीं पाई क्योंकि बिहार में कांग्रेस के कार्यकर्ता ही इतने कम हैं कि सब मिलकर चिल्लाए तो भी बगल के घर तक आवाज नहीं पहुंचती है।

वैसे बीच में कांग्रेस के एक नेता ने भी कहा था कि वो सभी सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हैं मगर यहां हम चुटकुलों पर चर्चा बिल्कुल नहीं करना चाहते। फिलहाल खबर ये है कि कांग्रेस कुछ 60 से 70 सीट पर चुनाव लड़ सकती है। लालू यादव से उनका गठबंधन हो चुका है।
ऐसे आरोप पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर लगाते रहेंगे
वैसे अब माहौल गरम है। चुनाव तक ऐसे आरोप पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर लगाते रहेंगे। वोट मिलने के बाद जनता को सजा देने वाले ये नेता केवल इसी वक्त कटघरे में खड़े होते हैं। ये एक समय होता है जब जनता जज भी बनती है और फैसला भी सुनाती है।

ये अलग बात है कि जनता जो भी फैसला सुनाती है आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ जब पांच वर्षों बाद जनता अपने फैसले से संतुष्ट हुई हो। एक तरह से आप कह सकते हैं कि वक्त चाहे कोई भी हो ये मुकदमा अबतक जनता ही हारती रही है। मगर इस बार जनता फिर से दांव खेलने जा रही है, अब जनता कितनी सफल होती है ये तो आनेवाला वक्त ही बताएगा।


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