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2015 विधानसभा चुनाव में लड़ीं सबसे ज्यादा 138 पंजीकृत पार्टियां, नेशनल पार्टियां 11 से 6 रह गईं

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  • The Highest Number Of 138 Registered Parties Fought In The 2015 Assembly Elections, The National Parties Reduced From 11 To 6

पटना2 घंटे पहले

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1951 में हुए पहले चुनाव में 11 नेशनल पार्टियां मैदान में थीं, धीरे-धीरे घटती गई संख्या।

  • क्षेत्रीय राजनीति और पार्टियों का ऐसे होता गया उभार

बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टियों की भागीदारी के आंकड़ों पर गौर करें तो क्षेत्रीय राजनीति और पार्टियों के उभार का सूत्र मिलता है। 1951 में हुए पहले चुनाव में 11 नेशनल पार्टियां मैदान में थीं, वहीं क्षेत्रीय दलों की संख्या सिर्फ 4 और पंजीकृत दल 1 था। पहले चुनाव में बिहार के साथ-साथ देश भर में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला था।

इसलिए 1957 में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की संख्या घट कर 4 और 2 रह गई। इस बार कोई भी पंजीकृत पार्टी मैदान में नहीं थी। क्षेत्रीय और पंजीकृत पार्टियों की सीट में बड़ा उछाल 1969 के चुनाव में देखा गया जब पहली बार इन दोनों पार्टियों की संख्या नेशनल पार्टियों की संख्या से ज्यादा हो गई। इस चुनाव में 7 राष्ट्रीय पार्टियां मैदान में थी।

जिनके मुकाबले 14 (4+10) क्षेत्रिय और पंजीकृत पार्टियों के उम्मीदवार चुनावी मैदान में अपना दावा पेश कर रहे थे। इसके बाद 1990 के विधानसभा चुनाव में जहां 8 राष्ट्रीय पार्टियां मैदान में थी। जिनके मुकाबले में 9 क्षेत्रीय और 32 पंजीकृत पार्टियां थीं। 1951 में जहां 11 पार्टियां मैदान में थीं वहीं 1990 में वह आठ रह गई।

2005 फरवरी में हुए चुनाव में उनकी संख्या 6 रह गई। जबकि 1951 में जहां 4 क्षेत्रीय दल और सिर्फ एक क्षेत्रीय दल था। वहीं 1990 में यह 5 और 32 हो गई। 2005 में इनकी संख्या 10 और 49 हो गई। 2015 के चुनाव में तो अबतक के सारे रिकॉर्ड ही टूट गए थे। तब 6 राष्ट्रीय पार्टियां और 152 क्षेत्रीय (13) और पंजीकृत पार्टियां (138) थीं।

स्टेट पार्टी: यदि लोकसभा चुनाव में पार्टी को संबंधित राज्य के कुल वोटों का कम से कम 8% वोट मिले हों। यदि विस चुनाव में पार्टी को संबंधित राज्य के कुल वोटों का कम से कम 8% वोट मिले हों। विस चुनाव में पार्टी को कम से कम 6% वोट मिले हों और पार्टी ने कम से कम 2 सीटें जीती हों। लोकसभा चुनावों में पार्टी को राज्य के 6% से ज्यादा वोट मिले हों, और 1 सीट भी जीती हो।

पार्टी ने विस चुनाव में कम से कम 3% सीटें जीती हों या 3 सीटें जीती हों (इन दोनों में से जो भी ज्यादा हो)। उस राज्य को आवंटित लोकसभा सीटों में से कम से कम 25/1 के अनुपात में लोकसभा सीटें जीती हों। मान लिजिए किसी राज्य में 75 लोकसभा सीटें हैं, इस रूल के हिसाब से 75 सीटों में से अगर कोई पार्टी 3 सीटें भी जीतती है तो उसको उस राज्य में ‘स्टेट पार्टी’ का दर्जा दिया जा सकता है।
नेशनल पार्टी
जब किसी पार्टी ने लोकसभा चुनावों में कम से कम 2% सीटें जीती हों, और ये सीटें कम से कम 3 अलग-अलग राज्यों की हों। तो आयोग ऐसी पार्टी को नेशनल पार्टी का दर्जा देता है। या पार्टी के पास 4 सीटें हों और उसे कुल वोटों का कम से कम 6% वोट मिला हो। या पार्टी के पास 4 सीटें हों और उसे कम से कम चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में 6% से ज्यादा वोट मिले हों। पार्टी को 6 राज्यों में ‘स्टेट पार्टी’ की मान्यता हो।

पंजीकृत पार्टियां: सरल शब्दों में जो पार्टियां इन दोनों दायरे में नहीं आ पाती है उन्हें पंजीकृत पार्टियों के दायरे में रखा जाता है। ऐसी पार्टियां मान्यता प्राप्त नहीं होती लेकिन चुनाव आयोग में पंजीकृत होती है।


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