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दियारे का दर्द नहीं हो पा रहा है दूर, नगरीय सुविधाओं से दूर हैं लोग, यही चुनावी मुद्दा

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पटना3 मिनट पहले

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  • नगर परिषद क्षेत्र में शहरीय विकास की योजनाओं को तेजी से लागू कराने में नहीं मिल पा रही है सफलता
  • सीवरेज व ड्रेनेज के साथ-साथ कनेक्टिविटी की समस्या ने लोगों की परेशानी को बढ़ाया, इस बार लड़ाई दिलचस्प

(बख्तियारपुर से राहुल पराशर व पुरुषोत्तम) दियारा का दर्द दूर करने में अब तक कामयाबी नहीं मिल पा रही है। कनेक्टिविटी की समस्या का सामना लोगों को करना पड़ रहा है। गंगा नदी से होने वाला कटाव पिछले तीन वर्षों से बख्तियारपुर क्षेत्र को बख्शे हुए है। लेकिन, सबसे बड़ी परेशानी टाल क्षेत्र की है। टाल क्षेत्र छह माह तक पानी में डूबा हुआ रहता है।

किसानों को इस कारण एक ही फसल से संतोष करना पड़ता है। पूरे प्रदेश में तीन फसल किसान उपजाते हैं। इन किसानों की जमीन को जलजमाव से मुक्त करने के लिए चुनावों में हर दल की ओर से लगातार दावे किए जाते हैं। वादे किए जाते हैं। इन योजनाओं को जमीन पर उतारने में कामयाबी नहीं मिल पा रही है। बख्तियारपुर नगर पंचायत क्षेत्र होने के बाद भी लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है।

जलापूर्ति योजनाओं को पूरा करने के लिए करीब दस साल में ओवरहेड पानी टंकी बनाई गई। जलापूर्ति योजना को तो शुरू कर दिया गया, लेकिन सबसे अधिक परेशानी अब सड़कों के खोदे जाने को लेकर है। नाली-गली पक्कीकरण की मांग जोर पकड़ रही है। गंगा नदी के किनारे का शहर होने के कारण यहां पर नमामि गंगे योजना के तहत सीवरेज व ड्रेनेज प्रोजेक्ट पर काम किया जाना था, लेकिन इसे अब तक नहीं शुरू कराया जा सका है।

दियारा क्षेत्र से छह माह तक कनेक्टिविटी की समस्या, टाल क्षेत्र छह माह तक पानी में डूबा हुआ रहता है

दियारा क्षेत्र से करीब छह माह तक कनेक्टिविटी की समस्या बनी रहती है। अमूमन, दिसंबर में बख्तियार से दियारा क्षेत्र को जोड़ने के लिए पीपा पुल का निर्माण किया जाता है। जून में इसे खोल देना पड़ता है। जुलाई से नवंबर तक दियारा क्षेत्र में रहने वाली करीब 50 हजार की आबादी को शहर से जुड़ने के लिए नाव का ही सहारा रहता है। इस इलाके में रहने वाले लोगों को पानी, बिजली व सड़क की समस्या का सामना करना पड़ता है। बारिश के मौसम में तो गांवों में पानी घुसने से अधिक परेशानी बढ़ी हुई रहती है।
तीन प्रखंडों को मिलाकर बनी है यह विस सीट

बख्तियारपुर विस सीट को केवल बख्तियारपुर नहीं माना जा सकता है। खुशरूपुर व दनियावां प्रखंड भी इस सीट के दायरे में आते हैं। इन दोनों प्रखंडों का बड़ा भाग ग्रेटर पटना के दायरे में भी आता है। इससे इन इलाकों में विकास योजनाएं शुरू हो गई हैं। लेकिन, अन्य योजनाओं को लेकर अब तक इन विकास योजनाओं को रेगुलेट करने वाली कोई एजेंसी नहीं होने से लोगों को अनियंत्रित विकास की चिंता सताने लगी है।

इस सीट पर राजपूत वोटर निर्णायक
बख्तियारपुर सीट पर सबसे बड़ा वोट बैंक यादव का है। करीब 62 हजार वोट इस जाति से आते हैं। लेकिन, इस सीट पर निर्णायक वोटर राजपूत होते हैं। इनके वोटों की संख्या करीब 40 हजार है। वहीं, करीब 20 भूमिहार वोटर हैं। 45 हजार अतिपिछड़ा वोटर मिलकर चुनावी समीकरण को बनाने व बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

क्षेत्र में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
एनडीए की ओर से एक बार फिर यह सीट भाजपा के पाले में आई है। एक बार फिर पार्टी ने सिटिंग विधायक रणविजय सिंह उर्फ लल्लू मुखिया पर दांव आजमाया है। महागठबंधन की ओर से राजद ने अभी तक अपने उम्मीदवार नहीं घोषित किए हैं, लेकिन क्षेत्र में चर्चा है कि एक बार फिर पूर्व विधायक अनिरुद्ध कुमार लड़ेंगे। इस बीच भाजपा के पूर्व विधायक विनोद यादव अब रालोसपा में पहुंच गए हैं। तीनों ही उम्मीदवार को दमदार माना जा रहा है। ऐसे में मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार हैं।


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