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प्रो. अरूण कुमार का बनारस में होगा दाह संस्कार: पूर्व सभापति के पार्थिव शरीर को विधान परिषद् नहीं ले जाया जाएगा, 41 सालों तक रहे थे MLC

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पटना16 मिनट पहले

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विधान परिषद के पूर्व सभापति प्रो. अरुण कुमार। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar

विधान परिषद के पूर्व सभापति प्रो. अरुण कुमार। (फाइल फोटो)

  • वर्ष 2006 में विधान परिषद् की नियुक्ति रद्द करने से चर्चा में आए थे
  • 25 मई 1970 से 9 मई 2011 तक विधान परिषद के सदस्य रहे

बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति प्रो. अरुण कुमार का दाह संस्कार बनारस के मणिकर्णिका घाट पर किया जाएगा। उनकी सबसे बड़ी कर्मस्थली बिहार विधान परिषद् में पार्थिव शरीर को नहीं ले जाया जाएगा। परिषद् के कई कर्मी कोरोना से पीड़ित हैं और कुछ की मौत भी हो चुकी है। इस वजह से विधान परिषद् पूरी तरह से बंद है। 41 सालों तक विधान परिषद के सदस्य रहे प्रो. अरुण कुमार ने बुधवार की रात अंतिम सांस ली। वे पिछले कई सालों से बीमार चल रहे थे।

पटना स्थित आवास पर पूर्व सभापति प्रो. अरुण कुमार का पार्थिव शरीर।

पटना स्थित आवास पर पूर्व सभापति प्रो. अरुण कुमार का पार्थिव शरीर।

इसलिए 2006 में चर्चा में आए थे

पूर्व सभापति का निधन पटना के पटेल नगर स्थित उनके आवास पर हुआ। 90 साल के प्रो. अरुण कुमार बीमारी की वजह से पिछले कई सालों से घर से भी नहीं निकलते थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित कई नेताओं ने पूर्व सभापति के निधन पर शोक व्यक्त किया। CM ने उनके बेटे से बातचीत की। साथ ही कहा कि प्रो. अरुण कुमार का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। वर्ष 2006 में बिहार विधान परिषद् में हुई नियुक्तियों को रद्द कर वे चर्चा में आए थे।

पैतृक गांव ले जाया जाएगा पार्थिव शरीर

प्रो. अरुण कुमार के पार्थिक शरीर को पटना से उनके कर्मक्षेत्र सासाराम ले जाया जाएगा। इसके बाद पैतृक गांव में लोग दर्शन करेंगे। फिर बनारस के मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार किया जाएगा। पूर्व सभापति का जन्म 2 जनवरी 1931 को मछनहट्टा ( दुर्गावती ) में हुआ था। वे गया शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर जीत कर आते थे। पहली बार 25 मई 1970 को विधान परिषद् के सदस्य बने। इसके बाद 9 मई 2011 तक परिषद के सदस्य रहे। बिहार विधान परिषद् में जुलाई 1985 को सभापति बने और अक्टूबर 86 तक रहे। दूसरी बार अप्रैल 1990 में सभापति बने और अगस्त 2009 तक रहे। अप्रैल 2006 से अगस्त 2009 तक वे कार्यकारी सभापति रहे। करीब 41 वर्षों तक वे विधान परिषद् के सदस्य रहे।

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