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मुंबई में बेबसी की रातभर आंखों देखी: ट्रेन के इंतजार में बैठे लोगों के पास न खाना और न पैसा; 3-3 दिन से स्टेशन पर पड़े हैं, पुलिस भी डंडे बरसा रही

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मुंबईकुछ ही क्षण पहलेलेखक: राजेश गाबा

इस सफर में नींद ऐसी खो गई, हम न सोये, रात थक कर सो गई… राही मासूम रजा की ये पंक्तियां मुंबई में लोकमान्य तिलक टर्मिनस, यानी LTT पर ट्रेन के इंतजार में बैठे प्रवासी मजदूरों की बेबसी बयां करती हैं।

कोरोना की दूसरी लहर और लॉकडाउन के बीच घर लौटने को मजबूर लोग एक बार फिर बेबसी की त्रासदी झेल रहे हैं। दिन में इनकी दुश्वारियों की ढेरों तस्वीरें सामने आ रही हैं, पर रात में क्या मुश्किलें होती हैं, ये जानने के लिए भास्कर रिपोर्टर मौके पर पहुंचा। उनके साथ रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक का वक्त गुजारा। आप भी पढ़िए इन 12 घंटों की बेबसी की 6 कहानियां…

पहली कहानी: लॉकडाउन के बाद असमंजस में मजदूर, स्टेशन पर पुलिस भी डंडे मार रही
रात 8:45 मिनट पर मुंबई में धारा-144 लागू हो चुकी थी, यही वह वक्त था, जब टैक्सी पकड़कर प्रभादेवी से 9:00 बजे LTT पहुंचा। स्टेशन के बाहर यूपी-बिहार के सैकड़ों लोगों का डेरा दिखाई दिया। कोई लेटा था, तो कोई बैठा था। स्कैनिंग नहीं हो रही थी और ना ही सोशल डिस्टेंसिंग दिखाई पड़ी। कइयों ने मास्क नहीं पहने थे। सबकी बातों, चेहरों और आंखों में एक ही सवाल था- घर पहुंचेंगे कि नहीं? इस असमंस की उनके पास वजहें भी थीं। न टिकट है और ना खाना। बिहार के पप्पू इलेक्ट्रिशयन हैं। बताने लगे, “पूरे परिवार के साथ स्टेशन के लिए निकला तो बीच रास्ते में पता चला कि लॉकडाउन लग गया है। सोच में पड़ गया कि बिहार जाऊं या वापस नालासोपारा लौट जाऊं।’

बिहार जाने के लिए घर से निकले पप्पू कुमार सिंह अपने परिवार के साथ।

स्टेशन के बाहर हर कोई टिकट, ट्रेन को लेकर उलझन में था। बताने वाला कोई नहीं। पुलिस के पास जाएं तो डंडे पड़ते हैं। प्रवासी मजदूर हैरान हैं कि हिफाजत के लिए जिम्मेदार पुलिस आखिर किस गलती के लिए डंडे बरसा रही है। हर किसी का टिकट चेक कर रही है और ऐलान कर रही है कि बिना टिकट वाले वापस लौट जाएं।

पुलिस वाले बगैर टिकट वालों को डंडा मारकर भगा रहे थे।

पुलिस वाले बगैर टिकट वालों को डंडा मारकर भगा रहे थे।

ट्रेन के इंतजार में स्टेशन के बाहर की भीड़।

ट्रेन के इंतजार में स्टेशन के बाहर की भीड़।

दूसरी कहानी: सेठ ने पूरा पैसा नहीं दिया, टिकट भी नहीं है, अब घर कैसे जाएंगे

रात करीब 10 बजे बिहार जा रहे धीरज कुमार से बात हुई, जो टाइल्स मार्बल के मिस्त्री हैं। कहने लगे, “लॉकडाउन के कारण अब गांव जा रहे हैं। काम किया है, लेकिन कंपनी के सेठ ने इस बार का पूरा पैसा भी नहीं दिया। बोला कि तुम जाओ, बैंक अकाउंट में डाल दूंगा। पिछली बार भी लॉकडाउन में हम दो महीने मुंबई में फंस गए थे। गांव से पैसा मंगवाना पड़ा था। तब भी सेठ ने पैसा काट लिया था। घर जाकर भी मजदूरी की, तब रिश्तेदारों का कर्ज चुका पाया। अब फिर यही चिंता कि पैसा नहीं है, टिकट भी नहीं। गांव कैसे जाएंगे। दोपहर 3 बजे से आया हूं।’

तीसरी कहानी: लॉकडाउन में दिक्कत होती ही है, अब गांव में ही खेतीबाड़ी का फैसला

पप्पू सहानी को गोरखपुर जाना है, वो कबाड़ का काम करते हैं। 6 महीने पहले ही ये काम शुरू किया था। लॉकडाउन लगने से दिक्कत होनी तय है। बचत है नहीं और अब खाने की भी किल्लत हो रही है। सुबह 5 बजे की गाड़ी से जाना है। कहते हैं कि तय कर लिया है, अब गांव में मजदूरी या खेती बाड़ी करूंगा।

चौथी कहानी: टॉयलेट तक लोगों को भगाया गया, कई भूखे-प्यासे ही इंतजार करते रहे

रात 11 बज रहे होंगे। स्टेशन पर नजर दौड़ाई तो देखा कि टॉयलेट से भी लोगों को भगाया जा रहा था। पुरुष तो स्टेशन के बाहर जैसे-तैसे फारिग हो ले रहे थे, पर महिलाओं के लिए दिक्कत और ज्यादा थी। कुछ ने तो इसी वजह से घंटों तक पानी ही नहीं पीया। कई लोग ऐसे थे, जिनके पास पानी खरीदने तक के पैसे नहीं थे। जब देखा नहीं गया तो कुछ बोतलें पानी की खरीदीं और जिनकी जरूरत ज्यादा लगी, उन्हें दे दी। भूखे जो थे, वो भूखे ही रहे, क्योंकि खाने के लिए स्टेशन पर कुछ नहीं था।

हालांकि, भूख-प्यास से ऊपर लोगों के चेहरे पर एक ही बात की फिक्र दिखी। लॉकडाउन में न फंसकर घर लौट जाने की। कोई सोया था तो कोई जागा था। कुछ डर के मारे जाग रहे थे कि कोई सामान न ले जाए। अचानक शोर सुनाई देता था। पता चलता कोई चोर आ गया था। शोर को खत्म करने के लिए पुलिस आ जाती थी।

जिसको जहां जगह मिली, वो वहीं बैठ गया या सो गया। भले ही सड़क ही क्यों न हो।

जिसको जहां जगह मिली, वो वहीं बैठ गया या सो गया। भले ही सड़क ही क्यों न हो।

पांचवीं कहानी: सेठ न खाना देता है और न पैसा, टिकट भी नहीं मिल रही

रात करीब एक बजे पार्क में रखे गए इंजन को देखा। यहां भी लोग लेटे थे। कुछ लड़के कहने लगे कि यहां मजदूरी करने आए थे। सेठ ने पैसे नहीं दिए। भाड़े का पैसा है बस, लेकिन टिकट नहीं मिल रही। कैसे घर जाएंगे। सेठ ने कहा कि अभी काम भी बंद। थोड़ी देर पहले दो साहब आए वो बोले 2000 रुपए लगेंगे बिहार के और यूपी के। टिकट के साथ बैठने की सीट मिलेगी। हम कहां से देते साहब।

LTT के मैदान में ट्रेन का इंतजार करते मजदूर।

LTT के मैदान में ट्रेन का इंतजार करते मजदूर।

छठवीं कहानी: घरवाले और बच्चे कह रहे हैं कि पापा कोई भी गाड़ी पकड़कर आ जाओ

टाटा नगर जा रहे जहांगीर मुंबई में सिलाई का काम करते थे। बताया कि गांव के 4 लोग साथ जा रहे हैं। बड़ी मुश्किल से जनरल का टिकट मिला है। हमारी रात को 12 बजे की ट्रेन है, लेकिन अभी जाने नहीं दे रहे। अब हम देखते हैं कब अंदर जाने देंगे। हम चार हफ्ते पहले ही मुंबई काम के लिए आए थे। पिछले साल हम फंस गए थे। खाने के लिए तरस रहा था। घर से पैसा बुलाकर ट्रक से गया था।

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