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वादे याद दिलाने का टाइम आया: NMCH में 600 बेड का कोरोना डेडिकेटेड अस्पताल पिछले साल ही बनना था, लहर थमते प्रोजेक्ट भी भूल गई सरकार

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पटना8 मिनट पहलेलेखक: बृजम पांडेय

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बीते साल वादा करने के बाद भी NMCH में नहीं बढ़ाए गए कोई संसाधन। - Dainik Bhaskar

बीते साल वादा करने के बाद भी NMCH में नहीं बढ़ाए गए कोई संसाधन।

  • एक साल बाद भी नहीं मिली 600 बेड की प्रशासनिक स्वीकृति
  • आनन-फानन में बनाया ब्लू प्रिंट भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया

बिहार में कोरोना की बेलगाम रफ्तार से एक्टिव केस मात्र 15 दिनों में 74 से 44,700 पहुंच गए हैं। अब तक 1749 मौतें हो चुकी हैं। राजधानी पटना की हालत यह है कि सरकारी के साथ निजी अस्पतालों में भी बेड फुल हैं। गंभीर मरीजों की भर्ती में पैरवी भी काम नहीं आ रही। ऐसे में बिहार सरकार को उन वायदों की याद दिलानी जरूरी है, जो बीते साल किए गए थे. इनके पूरे न होने पर हाईकोर्ट से फटकार भी लगी है।

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NMCH है लापरवाही का बड़ा उदाहरण

वर्ष 2020 में जब कोरोना की पहली लहर आई थी, तब सरकार ने अलग अस्पताल बनाने से लेकर स्वास्थ्य विभाग में खाली पदों को भरने की भी बात कही थी। अब जरा सरकार के कछुआ चाल को देखिए या यूं कह लीजिए कि यह लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण है –

बिहार सरकार ने पिछले साल पटना के NMCH को कोविड डेडिकेटेड हॉस्पिटल बनाने का फैसला किया था। इसके लिए मेडिसिन वार्ड को 600 बेड का बनाने की बात कही गई थी। अलग से स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती के साथ जरूरी संसाधनों की आपूर्ति करने का निर्णय भी लिया गया था। सरकार ने आनन-फानन में ब्लू प्रिंट भी बनाया। लेकिन, कोरोना का कहर थमने के साथ ही प्रस्ताव को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

अब एक साल बाद भी मेडिसिन वार्ड को 600 बेड का बनाने की प्रशासनिक स्वीकृति नहीं मिली है। डॉक्टर, स्वास्थ्य कर्मी और नर्सो की कमी के साथ-साथ अस्पताल में किसी प्रकार के कोई संसाधन नहीं बढ़ाए गए हैं। अब जब कोरोना के केस बढ़ने लगे हैं, तब भी सरकार की नींद नहीं खुली है। पिछली बार कुछ स्टेडियम और सामुदायिक भवनों को केयर सेंटर में बदला था, इस बार तो ध्यान ही नहीं है।

कोर्ट में बताना पड़ रहा- डॉक्टरों के पद खाली; लेकिन, भरे नहीं गए
पिछले हफ्ते ही पटना हाईकोर्ट ने लापरवाही पर बिहार सरकार को फटकार लगाई थी। स्वास्थ्य विभाग ने पिछले साल 16 मई 2020 को पटना हाईकोर्ट को बताया था कि राज्य में डॉक्टरों के कुल 11,645 स्वीकृत पदों में से 8,768 खाली पड़े हैं। इन 8,768 खाली पड़े पदों में 5600 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। इससे पहले 2019 में बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि डॉक्टरों के 57 फीसदी पद खाली हैं। नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों के भी 75 फीसदी पद खाली हैं। अभी तक यह खाली पद भरे नहीं गए हैं।

बजट में खर्च सिर्फ बिल्डिंग बनाने में, कर्मियों पर नहीं
बिहार सरकार के बजट को देखा जाए तो पिछले साल के मुकाबले स्वास्थ्य पर 21.28 फीसदी ज्यादा खर्च है। लेकिन, इसमें बड़ी राशि अस्पतालों के निर्माण पर खर्च हो रही है। खाली पड़े पदों पर स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती में नहीं। ऐसे में पूरे देश-दुनिया में बिहार की इस व्यवस्था की किरकिरी हो रही है।

इस साल के बजट में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने के नाम पर 1539 फार्मासिस्टों, 163 ECG टेक्नीशियन और 1096 OT सहायक की नियुक्ति की बात कही गई है। लेकिन, डॉक्टरों और नर्सों के खाली पड़े पदों को भरने के बारे में कोई बात नहीं की गई। बिहार में 11,875 सरकारी अस्पताल हैं, जिसमें 9,949 स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं। बाकी 2,026 अस्पतालों की व्यवस्था एक डॉक्टर और एक या दो नर्सों के भरोसे चलती हैं। वहीं, 2020-21 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि राज्य के हर अस्पताल में औसतन 308 OPD मरीज पहुंचते और 55 भर्ती होते हैं।

एक बार फिर NMCH को कोविड डेडिकेटेड बनाने की बात

कुछ दिन पहले बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय ने NMCH को कोविड डेडिकेटेड अस्पताल बनाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि यहां सिर्फ कोविड मरीजों का इलाज किया जाएगा और उन्हें ही एडमिट भी किया जाएगा। इसके अलावा किसी और बीमारी का इलाज नहीं किया जाएगा। इसके बाद अगले आदेश तक NMCH में सामान्य ऑपरेशन और OT को बंद कर दिया गया है।

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